Madhepura:भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय में बेहतर शैक्षणिक माहौल बनाने अथवा छात्र-छात्राओं को अकादमिक गतिविधियों से जोड़ने के प्रति भले अपेक्षित सजगता नहीं दिखाई जाती हो, किंतु पीएचडी से जुड़े प्री-सबमिशन एवं सबमिशन के दौरान रिफ्रेशमेंट और लंच के नाम पर शोधार्थियों पर अनावश्यक दबाव बनाए जाने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। आरोप है कि इन अवसरों पर खान-पान की व्यवस्था के नाम पर शोधार्थियों का आर्थिक एवं मानसिक शोषण होता है।
इस संबंध में पूर्व एआईएसएफ राष्ट्रीय परिषद सदस्य डॉ. हर्ष वर्धन सिंह राठौर ने कुलाधिपति, कुलपति, डीएसडब्ल्यू, कुलसचिव एवं परीक्षा नियंत्रक को पत्र लिखकर इस परंपरा को दुखद, चिंताजनक और शर्मनाक बताया है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय अंतर्गत अधिकांश विभागों में प्री-सबमिशन और सबमिशन के अवसर पर व्यापक खान-पान की व्यवस्था शोधार्थियों से करवाने की चर्चा विश्वविद्यालय की गरिमा को आघात पहुँचाती है।
ऐसी परंपरा से शोधार्थी आर्थिक और मानसिक रूप से टूटते हैं
डॉ. राठौर ने अपने पत्र में उल्लेख किया कि शोध के दौरान अधिकांश शोधार्थी पहले से ही आर्थिक और मानसिक दबाव में रहते हैं। ऐसे में रिफ्रेशमेंट और भोजन के नाम पर अतिरिक्त बोझ डालना उनके शोषण का प्रतीक है। आरोप है कि नाश्ते के नाम पर 25 से 100 पैकेट तक तथा भोजन के नाम पर 15 से 30 प्लेटों की व्यवस्था तक करवाई जाती है, जिससे शोधार्थियों पर भारी आर्थिक भार पड़ता है।
भोजन में महंगे व्यंजनों की भी रहती है मांग
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पत्र में यह भी कहा गया है कि कई शोधार्थियों ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया कि प्रायः विशेष रेस्टोरेंट से ही भोजन मंगाने का दबाव बनाया जाता है। कई अवसरों पर मछली, चिकन, मटन फ्राई जैसे व्यंजनों सहित विस्तृत भोजन की व्यवस्था करनी पड़ती है। चाय, पानी और कोल्ड्रिंक्स अलग से शामिल होते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में शोधार्थियों को लगभग 20,000 से 35,000 रुपये तक अतिरिक्त खर्च वहन करना पड़ता है, जिसके लिए कई बार उन्हें कर्ज तक लेना पड़ता है। असमर्थता जताने पर “यह परंपरा है” कहकर दबाव बनाए जाने की भी शिकायत की गई है।
रिफ्रेशमेंट और लंच के नाम पर शोषण पर सख्ती से रोक की मांग
डॉ. राठौर ने कुलपति सहित सभी वरीय पदाधिकारियों से मांग की है कि इस प्रकार की प्रथा पर अविलंब रोक लगाई जाए। उन्होंने सुझाव दिया कि यदि आवश्यक हो तो विभागीय स्तर पर केवल चाय-पानी और बिस्किट जैसी सामान्य व्यवस्था की जाए, जो व्यवहारिक भी होगी और शोधार्थियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी नहीं डालेगी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह प्रवृत्ति शिक्षकों के आचरण के विरुद्ध है और इसे तत्काल समाप्त किया जाना चाहिए, ताकि शोधार्थियों के आर्थिक एवं मानसिक शोषण पर रोक लग सके।
