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Madhepura:श्रीनगर में श्रृंगी ऋषि का 5000 वर्ष पुरानी शिवालय और वैदिक काल,कुषाण काल और उत्तर गुप्तकाल का इतिहास एक नजर में

Madhepura:जिले के घैलाढ़ प्रखंड स्थित श्रीनगर की धरती सनातन संस्कृति की ऐसी विरासत को अपने कण-कण में समेटे हुए है, जो आज भी अपने पौराणिक गौरव की गाथा सुनाती प्रतीत होती है। यह क्षेत्र हजारों वर्षों पुराने इतिहास का साक्षी है, जहां अतीत की स्मृतियां आज भी जीवंत रूप में मौजूद हैं।

यहां खुदाई के दौरान प्राप्त शैवाल पत्थर के अवशेष अपनी अद्भुत कलाकारी के माध्यम से प्राचीन सभ्यता की कहानी बयां करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ये कलाकृतियां लगभग तीन से चार हजार वर्ष पुरानी बताई जा रही हैं, जो इस क्षेत्र के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को और भी सुदृढ़ करती हैं।

श्रीनगर में पग-पग पर सनातन इतिहास की छाप दिखाई देती है। यहां बिखरे पत्थरों पर उकेरी गई कलाकृतियां मानो चीख-चीखकर अपने गौरवशाली अतीत की जानकारी दे रही हों। इसके साथ ही क्षेत्र में स्थित एक किलोमीटर से भी अधिक विस्तृत विशाल तालाब अपनी अनुपम सुंदरता के साथ श्रीनगर की प्राचीन समृद्धि की आंशिक कहानी स्वयं में समेटे हुए है।

श्रीनगर आज भी अपनी सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए आने वाली पीढ़ियों को सनातन परंपरा और इतिहास से जोड़ने का कार्य कर रहा है।पुरातात्त्विक प्रतिवेदन

स्थल : श्रीनगर, घैलाढ़ प्रखंड, मधेपुरा जिला (बिहार)

1. परिचय

घैलाढ़ प्रखंड अंतर्गत स्थित श्रीनगर क्षेत्र पुरातात्त्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल के रूप में उभर कर सामने आया है। यह क्षेत्र प्राचीन सनातन सभ्यता एवं सांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। स्थल पर प्राप्त अवशेष इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह भूभाग प्राचीन काल में मानव बसावट एवं धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र रहा है।

2. प्राप्त अवशेषों का विवरण

स्थल पर सतही निरीक्षण एवं आंशिक खुदाई के दौरान शैवाल पत्थर (काले पत्थर) से निर्मित विभिन्न कलात्मक अवशेष प्राप्त हुए हैं। इन पत्थरों पर उकेरी गई आकृतियां उच्च कोटि की शिल्पकला का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। प्राप्त कलाकृतियों में ज्यामितीय आकृतियां, धार्मिक प्रतीक एवं मानव-आकृति के संकेत देखे गए हैं।

3. काल निर्धारण

प्राप्त अवशेषों की शिल्प शैली, पत्थर की प्रकृति तथा घिसाव के आधार पर प्रारंभिक अध्ययन में इनका काल निर्धारण लगभग 3000 से 4000 वर्ष पूर्व (प्रागैतिहासिक से प्रारंभिक ऐतिहासिक काल) का अनुमानित किया गया है। हालांकि, वैज्ञानिक परीक्षण (कार्बन डेटिंग/पेट्रोग्राफिक अध्ययन) के उपरांत ही सटीक काल निर्धारण संभव होगा।

4. जल संरचनाएं

स्थल के समीप स्थित एक किलोमीटर से अधिक विस्तृत प्राचीन तालाब तत्कालीन जल प्रबंधन प्रणाली की उन्नत समझ को दर्शाता है। तालाब का आकार, तटबंध एवं जलधारण क्षमता यह संकेत देते हैं कि यह केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि धार्मिक एवं सामाजिक गतिविधियों का भी केंद्र रहा होगा।

5. ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व

श्रीनगर क्षेत्र में व्यापक स्तर पर फैले पत्थर के अवशेष इस बात की ओर संकेत करते हैं कि यह स्थल किसी संगठित बस्ती या धार्मिक केंद्र का हिस्सा रहा होगा। सनातन परंपरा से जुड़े प्रतीकों की उपस्थिति इसे प्राचीन धार्मिक स्थल के रूप में स्थापित करती है।

6. संरक्षण एवं अनुशंसा

यह स्थल राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर पर पुरातात्त्विक सर्वेक्षण के लिए उपयुक्त है।

अनुशंसा की जाती है कि—

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा विस्तृत सर्वेक्षण कराया जाए।

स्थल को संरक्षित क्षेत्र घोषित किया जाए।

अवैध खुदाई एवं क्षरण को रोकने हेतु त्वरित संरक्षण उपाय किए जाएं।

7. निष्कर्ष

प्रारंभिक अध्ययन के आधार पर श्रीनगर, मधेपुरा का यह स्थल बिहार की प्राचीन सभ्यता को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। उचित वैज्ञानिक अध्ययन एवं संरक्षण के माध्यम से यह स्थल इतिहास के कई अनछुए अध्यायों को उजागर कर सकता है।

7. स्थल निरीक्षण एवं प्रशासनिक पहल

इसी क्रम में खेल एवं सांस्कृतिक पदाधिकारी, मधेपुरा, सुश्री आम्रपाली कुमारी द्वारा श्रीनगर पुरातात्त्विक स्थल का स्थलीय निरीक्षण किया गया। निरीक्षण के दौरान उन्होंने स्थल पर उपलब्ध पुरातात्त्विक अवशेषों का निकट से अवलोकन एवं परीक्षण किया।

निरीक्षण के दौरान प्राप्त प्रतिमाओं, शिवलिंगों तथा उनसे संबद्ध अवशेषों का विधिवत प्रलेखन किया गया एवं प्रत्येक महत्वपूर्ण अवशेष को कैमरे में संकलित किया गया। इसके अतिरिक्त स्थल पर उपलब्ध लंबी-चौड़ी प्राचीन ईंटों, संरचनात्मक अवशेषों तथा संभावित महलनुमा स्थापत्य अवशेषों का भी सूक्ष्म निरीक्षण किया गया, जो प्राचीन नगरीय संरचना की ओर संकेत करते हैं।

8. अभिलेखीकरण एवं संरक्षण संबंधी निर्देश

खेल एवं सांस्कृतिक पदाधिकारी द्वारा यह अवगत कराया गया कि स्थल निरीक्षण से प्राप्त तथ्यों एवं साक्ष्यों के आधार पर संबंधित विभाग को विस्तृत निरीक्षण प्रतिवेदन प्रेषित किया जाएगा। साथ ही, स्थल पर बिखरे पुरातात्त्विक अवशेषों के अस्थायी संरक्षण एवं सुरक्षित संधारण हेतु स्थानीय विद्यालय को निर्देशित किया गया कि वे उपलब्ध अवशेषों को संग्रहीत एवं संरक्षित करने में सहयोग करें, जिससे अवशेषों को क्षति, चोरी अथवा क्षरण से बचाया जा सके।

9. प्रशासनिक निष्कर्ष

उक्त निरीक्षण से यह स्पष्ट होता है कि श्रीनगर क्षेत्र में उपलब्ध अवशेष न केवल ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि इनके संरक्षण एवं वैज्ञानिक अध्ययन की तत्काल आवश्यकता है। विभागीय स्तर पर की जा रही पहल इस दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक कदम मानी जा सकती है।

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