“अभिभावक की भूमिका निभाकर मामला सुलझाना चाहिए था, न कि शैक्षणिक कार्यक्रम रोकना”
Madhepura:भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय (बीएनएमयू) में पीएम उषा योजना के अंतर्गत प्रस्तावित शैक्षणिक आयोजनों की श्रृंखला को स्थगित किए जाने के निर्णय पर अब विभिन्न वर्गों से प्रतिक्रिया सामने आ रही है। इसी क्रम में पूर्व वाम नेता, युवा साहित्यकार एवं पूर्व छात्र नेता डॉ. हर्ष वर्धन सिंह राठौर ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर विश्वविद्यालय प्रशासन के इस फैसले को “असमय लिया गया और विश्वविद्यालय की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला” करार दिया है। उन्होंने कहा कि यह कदम न केवल शैक्षणिक वातावरण के लिए प्रतिकूल है, बल्कि विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान बनने के अवसर को भी कमजोर करता है।
डॉ. राठौर ने कहा कि पीएम उषा योजना के तहत लगभग ढाई माह तक चलने वाले सेमिनार, कार्यशालाएं, सम्मेलन, प्रशिक्षण कार्यक्रम एवं अन्य अकादमिक गतिविधियां बीएनएमयू के लिए एक सुनहरा अवसर थीं। इन आयोजनों से जहां लंबे समय से सुस्त पड़े शैक्षणिक माहौल में नई ऊर्जा का संचार होता, वहीं छात्रों, शोधार्थियों एवं शिक्षकों को ज्ञानवर्धन, संवाद और शोध के नए आयामों से जुड़ने का अवसर मिलता। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि इस प्रकार के कार्यक्रम किसी भी विश्वविद्यालय की बौद्धिक पहचान और अकादमिक प्रतिष्ठा को मजबूत करते हैं, परंतु आयोजन स्थगित होने से यह अवसर अधूरा रह गया।
उन्होंने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय केवल परीक्षा लेने और डिग्री देने का केंद्र नहीं होता, बल्कि वह बौद्धिक विमर्श, वैचारिक बहस और शोध की प्रयोगशाला भी होता है। ऐसे में जब विश्वविद्यालय स्वयं ही अपने शैक्षणिक कार्यक्रमों को रोक देता है, तो इसका सीधा संदेश बाहर यह जाता है कि संस्थान अंदरूनी विवादों और प्रशासनिक अस्थिरता से जूझ रहा है। इससे राज्य, देश और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वविद्यालय की नकारात्मक छवि बनने की आशंका बढ़ जाती है।
*“लोकतंत्र में विरोध स्वाभाविक, पर समाधान संवाद से”
डॉ. राठौर ने अपने बयान में कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और विश्वविद्यालय लोकतांत्रिक मूल्यों की सबसे बड़ी पाठशाला होते हैं। यहां असहमति, बहस और विरोध स्वाभाविक हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि विरोध के कारण शैक्षणिक गतिविधियों को ही ठप कर दिया जाए। उन्होंने कहा कि यदि किसी कार्यक्रम या विषयवस्तु पर छात्र संगठनों या अन्य पक्षों की आपत्ति थी, तो कुलपति को अभिभावक की भूमिका निभाते हुए सभी पक्षों को साथ बैठाकर समाधान निकालना चाहिए था।
उनके अनुसार कुलपति का दायित्व केवल प्रशासनिक निर्णय लेना नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय परिवार के बीच समन्वय स्थापित करना भी है। संवाद और जांच के माध्यम से समस्याओं का समाधान संभव था, परंतु सीधे कार्यक्रम स्थगित कर देना दूरदर्शिता की कमी को दर्शाता है।
*भविष्य पर पड़ सकता है नकारात्मक प्रभाव
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डॉ. राठौर ने आशंका जताई कि इस निर्णय का असर भविष्य में राज्य सरकार, केंद्र सरकार एवं अन्य शैक्षणिक संस्थाओं की बीएनएमयू के प्रति रुचि पर पड़ सकता है। यदि विश्वविद्यालय बार-बार इस प्रकार के कार्यक्रमों को टालता या रद्द करता है, तो बड़े स्तर के अकादमिक आयोजनों के लिए उसकी विश्वसनीयता कम हो सकती है। इससे न केवल फंडिंग और परियोजनाओं पर असर पड़ेगा, बल्कि राष्ट्रीय रैंकिंग और शोध अवसरों में भी गिरावट देखने को मिल सकती है।
उन्होंने यह भी कहा कि पहले से ही विश्वविद्यालय की रैंकिंग और शैक्षणिक स्थिति चुनौतियों से घिरी हुई है, ऐसे में इस तरह के निर्णय सुधार की दिशा में उठाए जा रहे कदमों को पीछे धकेल देते हैं। आम जनता और अभिभावकों के बीच भी विश्वविद्यालय की छवि प्रभावित होती है।
*“छात्र संगठन विश्वविद्यालय की आंख-कान”
अपने बयान के अंत में डॉ. हर्ष वर्धन सिंह राठौर ने कुलपति से अपील करते हुए कहा कि छात्र संगठन किसी भी विश्वविद्यालय की आंख-कान होते हैं। उन्हें विरोधी या असामाजिक तत्व मानने के बजाय विश्वविद्यालय परिवार का अभिन्न हिस्सा समझा जाना चाहिए। यदि किसी स्तर पर शिकायतें या कमियां हैं तो उन्हें स्वीकार कर सुधार की पहल करनी चाहिए, न कि टकराव की स्थिति उत्पन्न करनी चाहिए।
उन्होंने मांग की कि सभी कमियों की निष्पक्ष समीक्षा कर अविलंब शैक्षणिक आयोजनों को पुनः शुरू किया जाए, ताकि भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय को इसका “इंद्रधनुषी लाभ” मिल सके और वह अकादमिक, सामाजिक एवं बौद्धिक स्तर पर अपनी साख को मजबूत कर सके।
