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Madhepura:“विकास के नाम पर विनाश: कीचड़ में धंसी जनता, चमकती रही सत्ता!”

Madhepura:गाँव की पगडंडी पुकारे — सुनता है कौन यहाँ?

मिट्टी में दफ्न हुई सड़कों का, पूछे अब कौन निशाँ?

मुखिया जी की चमकती गाड़ी, धूल उड़ाती जाती है,

नंगे पाँव गरीब की किस्मत, कीचड़ में धँस जाती है।

सरपंच की चौपालों में, वादों का अंबार लगा,

पर हर गली के गड्ढों में, बरसों से पानी जगा।

फंड का पैसा आया था, पर कोठियों में समा गया,

कंक्रीट बिके सड़कों के, कोई महल बना गया।

चुनावों में जो झुकते थे, हाथ जोड़कर मिलते थे,

अब पहचानें भी नहीं, जब हम दर पर खिलते थे।

हर सावन में ये रास्ते, आँसू बनकर बहते हैं,

उनकी जेबों में नोट, और हम यूँ ही सहते हैं।

वोट लिया था विकास के नाम, मिला विनाश का जंजाल,

ये सड़क नहीं, भ्रष्टाचार का सीने में उतरा भाल।

जागो अब ऐ गाँव के लोगो, प्रश्नों की मशाल जलाओ,

कीचड़ भरी इन राहों का, पूरा हिसाब दिलवाओ।

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