Madhepura:कभी-कभी कोई फैसला उम्र से बड़ा होता है… और कोई सोच इंसान को अमर बना देती है। कर्पूरी नगर की रहने वाली लीजा मान्या ने अपने 23वें जन्मदिन पर ऐसा ही एक फैसला लिया—एक ऐसा संकल्प, जो उनकी सांसों के थम जाने के बाद भी कई जिंदगियों को रोशन करता रहेगा।

लीजा मान्या आज नोएडा स्थित हेल्थ एक्सेस में अकाउंट रिसीवेबल एनालिस्ट के रूप में कार्यरत हैं। देहरादून के उत्तरांचल विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी कर चुकी लीजा का जीवन व्यस्त जरूर है, लेकिन संवेदनाओं से भरा हुआ भी। अंगदान की घोषणा करते हुए उनकी आवाज़ में आत्मिक संतोष साफ झलकता है। वे कहती हैं—
“मृत्यु के बाद भी मेरी आँखें इस दुनिया को देखती रहेंगी, मेरा दिल किसी और के जीवन में धड़कता रहेगा। इससे बड़ा सुख और क्या हो सकता है?”
इस भावनात्मक सोच की जड़ें उनके परिवार में हैं—खासतौर पर उनकी बड़ी बहन गरिमा उर्विशा में। गरिमा न केवल वर्ष 2022 में अंगदान की घोषणा कर चुकी हैं, बल्कि नियमित रक्तदान के माध्यम से समाजसेवा की मिसाल भी बन चुकी हैं। रक्तदान के लिए उन्हें दो बार बिहार सरकार से सम्मान मिल चुका है। बहन की यही निस्वार्थ सेवा भावना लीजा के भीतर भी एक दीपक की तरह जलती रही।
यह सिर्फ दो बहनों की कहानी नहीं है। यह एक पूरे परिवार की संवेदनशील सोच है—जहाँ सुनीत साना, दिव्यांशु द्यंश, सुमित कुमार, विद्यांशु कुमार, शैब्यम शशि, अब्यम ओनू सहित परिवार के अन्य सदस्य समाजसेवा को अपना दायित्व मानते हैं। रक्तदान, जागरूकता और मानवीय मूल्यों के लिए यह परिवार लगातार प्रयासरत रहता है।
लीजा मान्या के इस निर्णय पर बहन गरिमा उर्विशा ने सोशल मीडिया पर भावुक शब्दों में लिखा—
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“इतनी कम उम्र में इतना बड़ा और परिपक्व निर्णय लेना मेरे लिए गर्व की बात है। तुम सच में मानवता की सच्ची सेवा कर रही हो।”
ये शब्द केवल एक बहन की भावना नहीं, बल्कि उस गर्व की अभिव्यक्ति हैं, जो हर संवेदनशील समाज महसूस करता है।
संकल्प मैत्री फाउंडेशन ने भी लीजा के इस साहसिक और प्रेरणादायक कदम की खुले दिल से सराहना की है। सोशल मीडिया पर अनगिनत लोग उन्हें बधाइयाँ दे रहे हैं—क्योंकि ऐसे फैसले सिर्फ खबर नहीं होते, वे सोच बदलते हैं।
लीजा मान्या की कहानी हमें याद दिलाती है कि जीवन की लंबाई से ज्यादा जरूरी है उसका अर्थ।
कुछ लोग मरने के बाद भी जीवित रहते हैं—लीजा मान्या उन्हीं में से एक हैं।