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Madhepura:पुण्यतिथि पर याद आते परमेश्वरी प्रसाद मंडल — डॉ. हर्ष वर्धन सिंह राठौर

Madhepura:साहित्य वाचस्पति परमेश्वरी प्रसाद मंडल का जीवन अंत तक संघर्षों से घिरा रहा, किंतु साहित्य-सृजन में उनकी कलम का कोई सानी नहीं था। 01 अगस्त 1921 को जिला मुख्यालय के चर्चित बालम गढ़िया में जन्मे मंडल जी ने 1945 में टी एन बी कॉलेज भागलपुर से बी.ए. किया और साहित्य विद्यापीठ से ‘साहित्य वाचस्पति’ की उपाधि प्राप्त की।

साहित्य के साथ-साथ उनकी राजनीतिक सक्रियता भी नेतृत्वकारी और प्रभावशाली रही। वे जिला कांग्रेस कमिटी, सहरसा के प्रथम अध्यक्ष बने और जयप्रकाश नारायण के छात्र आंदोलन में भाग लेने के कारण ढाई माह तक जेल में रहे। प्रशासनिक क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया—शुरुआती दौर में टी.पी. कॉलेज के पुस्तकालयाध्यक्ष रहे और वेदव्यास कॉलेज के संस्थापक प्राचार्य के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई।

उनकी रचनाएँ ‘योजनगंधा’, ‘प्रदीप’, ‘जीवन ज्योति’, ‘पारख प्रकाश’, ‘संवाद’ आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। दुर्भाग्यवश आर्थिक अभाव के कारण उनकी अनेक कालजयी रचनाएँ जीवनकाल में पुस्तकाकार प्रकाशित नहीं हो सकीं। सादगी, सरलता, सौम्यता और ईमानदारी के पर्याय रहे परमेश्वरी बाबू ताउम्र अभावों के बीच संघर्ष करते रहे।

रुद्रवेणुका : अधूरे स्वप्न को मिला आकार

विभिन्न विषयों पर खुलकर लेखन करने वाले परमेश्वरी बाबू का सपना था कि उनकी रचनाएँ एक संग्रह के रूप में प्रकाशित हों। 1996 में अस्वस्थता के दौरान उनके शुभचिंतकों—डॉ. आलोक कुमार, प्रो. शचींद्र महतो, डॉ. मधेपुरी, हरिशंकर शलभ, शिवनेश्वरी प्रसाद यादव, डॉ. रामचंद्र प्रसाद यादव सहित कई साहित्यप्रेमियों—ने आर्थिक सहयोग का निर्णय लिया। बैठकें हुईं, राशि एकत्रित हुई और उनकी रचनाओं को पुस्तकाकार देने की प्रक्रिया शुरू हुई।

डॉ. आलोक कुमार के नेतृत्व, डॉ. मधेपुरी की प्रकाशन-प्रक्रिया में सहभागिता, आर्या दास, दशरथ प्रसाद कुलिश सहित अनेक लोगों के सहयोग तथा मणिभूषण वर्मा के संपादन-कार्य से अप्रैल 1997 में ‘रुद्रवेणुका’ प्रकाशित हुई। किंतु नियति की विडंबना देखिए—21 फरवरी 1997 को, प्रकाशन से महज दो माह पूर्व, उन्होंने अंतिम सांस ली।

‘रुद्रवेणुका’ शीर्षक का अर्थ स्वयं उन्होंने स्पष्ट किया था—“पौरुष का गीत मधुर आवाज में।” डॉ. आलोक कुमार के अनुसार उनकी रचनाएँ मनुष्य के भीतर की ऊर्जा को जागृत करती हैं और सामाजिक विषमता, अनाचार व दुराचार पर करारा प्रहार करती हैं। प्रस्तावना लेखक खगेंद्र ठाकुर (तत्कालीन राष्ट्रीय महासचिव, प्रगतिशील लेखक संघ) ने उनकी वर्ण-व्यवस्था, ब्राह्मणवाद और जातिवाद संबंधी गहरी समझ की सराहना की थी।

उपेक्षित समाधि स्थल और पुस्तकालय

गांव में निर्मित उनकी समाधि स्थल कभी गर्व का प्रतीक थी, किंतु आज उचित देखरेख के अभाव में जीर्ण-शीर्ण हो चली है। उनके नाम पर तत्कालीन एमएलसी विजय कुमार वर्मा के कोष से बना पुस्तकालय भवन भी उपेक्षा का शिकार है। आवश्यकता है कि समाधि स्थल को पूर्ण रूप दिया जाए और पुस्तकालय को व्यवस्थित कर जनोपयोगी बनाया जाए—यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

विविध विषयों के सशक्त कवि

परमेश्वरी प्रसाद मंडल ने ‘कृष्णार्पण’, ‘मधेपुरा के राजमार्ग पर’, ‘मधेपुरा की पावन माटी’, ‘बदल’, ‘सत्यकाम जाबाल’, ‘अभिलाष देव अकाल है’, ‘मान ले कर्पूरी की बात’, ‘जीवन ज्योति जगे’, ‘जीवन चक्र’, ‘लौट नहीं आऊंगा’, ‘यों जीना है, यों मरना है’, ‘नया वर्ष’, ‘किसका होता है बलिदान’, ‘आरक्षण अधिकार हमारा’, ‘किस-किस को दूं दोष’ जैसी अनेक रचनाओं के माध्यम से सामाजिक चेतना को स्वर दिया।

इस क्षेत्र के प्रथम साहित्य वाचस्पति परमेश्वरी प्रसाद मंडल को उनकी पुण्यतिथि पर कृतज्ञ समाज का विनम्र नमन।

डॉ. हर्ष वर्धन सिंह राठौर,प्रधान संपादक, युवा सृजन,सचिव, आजाद पुस्तकालय, कतराहा, मधेपुरा

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