Madhepura:भूपेंद्र नारायण मंडल वाणिज्य महाविद्यालय साहूगढ़ मधेपुरा में दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का शुभारंभ हुआ। सेमिनार में भारत के स्वतंत्रता संग्राम, जैव विविधता संरक्षण एवं स्वदेशी पारंपरिक ज्ञान (आईटीके) में आदिवासियों का योगदान विषय पर देश विदेश के विद्वानों ने हाइब्रिड मोड में अपनी बातें रखी। सेमिनार का उद्घाटन बीएनएमयू के कुलपति प्रो. बीएस झा ने दीप प्रज्वलित कर किया। इस अवसर पर उन्होंने देश के निर्माण में आदिवासियों के योगदान पर सारगर्भित बातें रखी। कुलपति ने कहा कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम की नींव आदिवासियों ने ही रखी है। भले ही इतिहास में उन्हें उतना स्थान नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि आदिवासी गौरव वर्ष में आयोजित सेमिनार आदिवासियों के योगदान को बारीकी से जानने और समझने का अवसर मिलेगा। कुलपति प्रो. बीएस झा ने कहा कि तिलका मांझी, बिरसा मुंडा सरीखे आंदोलनकारियों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि वे भी संयुक्त बिहार के ही थे। बिहार और झारखंड भाई भाई है। उन्होंने कहा कि अगर ये लोग दूसरे समुदाय से होते तो उनका इतिहास ज्यादा लिखा जाता। अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष का साहस सबसे पहले आदिवासियों ने ही दिखाया। वे अपनी संस्कृति प्रकृति से सबसे ज्यादा प्यार करते हैं। वे पेड़ पौधे की पूजा कर जल जंगल और जमीन की रक्षा के लिए अपना बलिदान देते आए हैं। कुलपति ने कहा कि आदिवासी न सिर्फ स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी भूमिका निभाई बल्कि शोषण के खिलाफ भी पहला नींव डाला। वे अपनी संस्कृति, प्रकृति और आवोहवा को अभी भी बचा कर रखे हुए हैं। वे अभी भी पेड़ पौधे का उपयोग दवा के रूप में करते हैं। इतना के बावजूद हम उनसे अलग हैं। आज जरूरत है आदिवासियों के साथ मिलकर रहने की। कुलपति प्रो. झा ने कहा कि आदिवासियों के योगदान पर बेहतर शोध करने की जरूरत है। कुलपति ने सेमिनार के माध्यम से शिक्षक, छात्र और शोधार्थियों को ओरिजिनल रिसर्च करने की भी नसीहत दी। उन्होंने कहा कि कट एंड पेस्ट कर शोध नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि आदिवासियों के बीच जाकर पेड़ पौधे पर रिसर्च बेहतर परिणाम दे सकता है। उन्होंने शोध का अवलोकन करने की बात कही। कुलपति ने कहा कि बीएनएमयू अब शैक्षणिक रूप से वाइब्रेंट हो गया है। शैक्षणिक और शोध के मामले में विश्वविद्यालय का रैंकिंग ऊंचा हुआ है। जरूरत है सबों को मिलकर इस विश्वविद्यालय को आगे ले जाने की। कुलपति ने प्रधानाचार्य प्रो. संजीव कुमार को ऐसे सेमिनार आयोजित करने के लिए बधाई दी।
*स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत आदिवासियों ने की: रबिंद्र नाथ भगत

विनोबा भावे यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति प्रो. रबिंद्र नाथ भगत ने कहा कि आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों को इतिहास में उचित सम्मान नहीं मिला है। उन्होंने कहा कि 1776 में तिलका मांझी ने स्वतंत्रता आंदोलन की शुरुआत की थी। आदिवासियों ने कभी भी अंग्रेजों की गुलामी स्वीकार नहीं की। वे जोरदार आंदोलन करते रहे। आदिवासियों की आक्रमता को देखते हुए अंग्रेजों को झुकना पड़ा और समझौता करना पड़ा। इसके बावजूद वे उपेक्षित हैं। जरूरत है आदिवासियों के योगदान को वैश्विक पहचान देने की।
*जंगल आदिवासी महिलाओं का मायके के समान: प्रो. विद्यानाथ
एमएलएसएम कॉलेज दरभंगा के पूर्व प्रधानाचार्य प्रो. विद्यानाथ झा ने कहा कि जैव विविधिता संरक्षण में आदिवासियों का अनमोल योगदान है। उन्होंने कहा कि चिपको आंदोलन में गौरा देवी का अहम योगदान रहा है। जब सिपाही पहाड़ काटने पहुंचे तो गौरा देवी ने उसका प्रतिकार करते कहा कि जंगल हमारी मायका है। इसे किसी भी सूरत में काटने नहीं देंगे। उन्होंने असम के माजुली द्वीप की चर्चा करते कहा कि आदिवासियों ने वहां जंगल लगाया आज वह द्वीप प्रसिद्धि प्राप्त की है। प्रो. झा ने मोटे अनाज के संरक्षण में अतुलनीय योगदान में लहरी बाई की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि आदिवासी हर दृष्टि से जैव विविधिता के संरक्षक हैं। डायरेक्टर ऑफ द साउथ टेक्सास सेंटर ऑफ एक्सीलेंस इन कैंसर रिसर्च यूएसए प्रो. सुभाष चौहान ने सेमिनार को ऑनलाइन संबोधित किया। उन्होंने आदिवासियों के विभिन्न पहलुओं पर व्यापक चर्चा की।
*आदिवासियों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता: डॉ. गंगा सहाय
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जेएनयू में हिंदी ट्रांसलेशन सेंटर के डॉ. गंगा सहाय मीणा ने ने कहा कि भारतीय इतिहास को आदिवासी की दृष्टि से देखने की जरूरत है। स्वतंत्रता आंदोलन, जैव विविधिता संरक्षण स्वदेशी पारंपरिक ज्ञान औपनिवेशिक शासन से मुक्ति सबसे पहले आदिवासियों ने शुरू किया था। जमींदारी प्रथा, पितृ सत्ता, आर्थिक विषमता से मुक्ति के लिए आदिवासियों ने आंदोलन किया। उन्होंने कहा कि 1855 में हूल आंदोलन हुआ उसका दायरा बहुत व्यापक था। उसमें 60 हजार से अधिक लोगों की भागीदारी थी जिसमें 20 हजार आदिवासियों की मौत हुई थी। औपनिवेशिक और शोषण के खिलाफ लड़ते रहे। संविधान में उनकी मांग आरक्षण नहीं बल्कि स्वायतता थी। उन्होंने कहा कि आजादी की लड़ाई को नए सिरे से देखने की जरूरत है। इसके ऐतिहासिक श्रोत मौखिक साहित्य है। उन्होंने ऐसे सेमिनार को मील का पत्थर बताया।
पटना यूनिवर्सिटी के पॉलिटिकल साइंस के एच ओ डी प्रो. विनय सोरेन ने कहा कि दलित साहित्य काफी व्यापक हो रहा है। आदिवासियों पर अध्ययन करना बाकी है। उन्होंने कहा कि यह सेमिनार चिंगारी की तरह पूरे राज्य में फैलेगी।
*देश की रक्षा,अखंडता, जैव विविधिता की प्रेरणा आदिवासियों से मिलती है: प्रो. संजीव
सेमिनार आयोजन समिति के अध्यक्ष सह प्रधानाचार्य प्रो. संजीव कुमार ने अतिथियों का स्वागत किया। उन्होंने सेमिनार के औचित्य पर प्रकाश डाला। प्रधानाचार्य ने कहा कि पीएम नरेंद्र मोदी द्वारा अमृत भारत योजना के तहत इस वर्ष को आदिवासी गौरव वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है। आदिवासी कल्याण मंत्रालय और राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा सहयोग किया गया है। प्रधानाचार्य ने सेमिनार आयोजन में कुलपति प्रो. बीएस झा ने आदिवासियों के योगदान पर व्यापक प्रकाश डाला। देश की रक्षा, अखंडता, जैव विविधिता की प्रेरणा आदिवासियों से मिलती है। उन्होंने कहा कि यह सेमिनार व्यापक रूप लेगी। धन्यवाद ज्ञापन डॉ. कमलेश कुमार ने किया। सेमिनार में ऑर्गेनाइजिंग सेक्रेटरी डॉ. सत्येंद्र कुमार,आर एम कॉलेज सहरसा के प्रधानाचार्य प्रो. गुलरेज रौशन रहमान, एच एस कॉलेज उदाकिशुनगंज के प्रधानाचार्य प्रो. जवाहर पासवान, प्रॉक्टर डॉ. इम्तियाज अंजुम, क्रीड़ा निदेशक प्रो. अबुल फजल, प्रो. चंद्रप्रकाश सिंह, पूर्व प्रधानाचार्य प्रो. अरविंद कुमार, डॉ. सुधांशु शेखर, डॉ. संजय परमार, अमीष कुमार, निशा कुमारी, डॉ. प्रियंका, डॉ. माधुरी कुमारी सहित बड़ी संख्या में शिक्षक और शोधार्थियों मौजूद थे।
*महापुरुषों को किया नमन
बीएन एम वी कॉलेज में आयोजित सेमिनार में आए कुलपति सहित अतिथियों ने समाजवादी नेता भूपेंद्र नारायण मंडल, युवाओं के प्रेरणाश्रोत स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा और भगवान बिरसा मुंडा की तस्वीर पर पुष्पांजलि अर्पित कर उन्हें नमन किया। अतिथियों ने कॉलेज के बोटेनिकल गार्डन का भी निरीक्षण किया।