*जन सुराज पार्टी मधेपुरा के मुख्य प्रवक्ता रंजीत कुमार सिंह ने बाढ़ नियंत्रण योजनाओं, तटबंधों की मजबूती और सरकारी खर्च पर मांगा जवाब
Madhepura:बिहार में हर साल आने वाली बाढ़ और उससे होने वाली व्यापक तबाही को लेकर जन सुराज पार्टी मधेपुरा के मुख्य प्रवक्ता रंजीत कुमार सिंह ने सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि आजादी के 79 वर्ष बाद भी बिहार के करोड़ों लोग हर वर्ष बाढ़ की त्रासदी झेलने को मजबूर हैं, लेकिन अब तक इसका स्थायी और वैज्ञानिक समाधान नहीं निकल सका है।
रंजीत कुमार सिंह ने कहा कि बाढ़ केवल लोगों के घर और खेतों को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि पशुधन, छोटे कारोबार, रोजगार, सड़क, बिजली, शिक्षा और आम जनजीवन को भी भारी नुकसान पहुंचाती है। उन्होंने सवाल किया कि जब सरकार को पहले से पता रहता है कि बिहार के कई इलाके हर वर्ष बाढ़ की चपेट में आते हैं, तो दशकों बाद भी स्थायी समाधान की दिशा में प्रभावी काम क्यों नहीं हुआ?
उन्होंने कहा कि हर वर्ष बाढ़ से पहले और बाढ़ के दौरान राहत-बचाव, तटबंधों की मरम्मत, कटाव रोकने और अन्य कार्यों के लिए करोड़ों रुपये की योजनाएं बनाई जाती हैं। बजट जारी होता है और विभिन्न कार्यों पर खर्च भी किया जाता है। इसके बावजूद बाढ़ आने पर तटबंधों और बाढ़ नियंत्रण व्यवस्था की वास्तविक स्थिति सवालों के घेरे में आ जाती है।
रंजीत कुमार सिंह ने कहा कि “यदि इतने वर्षों से लगातार बाढ़ नियंत्रण और राहत कार्यों पर सरकारी धन खर्च हो रहा है, तो हर साल बिहार की जनता को उसी त्रासदी का सामना क्यों करना पड़ रहा है?”
उन्होंने CAG की रिपोर्टों का उल्लेख करते हुए कहा कि बिहार में बाढ़ नियंत्रण कार्यों के वित्तीय प्रबंधन और क्रियान्वयन को लेकर पूर्व में भी गंभीर टिप्पणियां सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि वर्ष 2024 की एक CAG रिपोर्ट में बाढ़ से निपटने के लिए खरीदे गए खाली सीमेंट बैगों के मामले में 21.98 करोड़ रुपये के avoidable expenditure का उल्लेख किया गया था।
उन्होंने कहा कि यह मामला किसी एक वर्ष या किसी एक विभाग तक सीमित नहीं है, बल्कि बिहार की दशकों पुरानी बाढ़ प्रबंधन नीति की समीक्षा का विषय है। पूर्व की ऑडिट रिपोर्टों में भी दीर्घकालिक संरचनात्मक उपायों, तटबंधों, जल प्रबंधन और योजनाओं के क्रियान्वयन में कमियों तथा देरी का जिक्र किया गया है।
*अनियमितता की निष्पक्ष जांच की मांग
जन सुराज नेता ने कहा कि बाढ़ नियंत्रण योजनाओं में यदि कहीं भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी, वित्तीय अनियमितता या लापरवाही हुई है तो उसकी निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि यदि किसी मंत्री, अधिकारी, अभियंता, कर्मचारी या ठेकेदार की भूमिका में सरकारी धन की बंदरबांट अथवा कार्य में अनियमितता साबित होती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ कठोर कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
उन्होंने सरकार से यह भी मांग की कि जनता के सामने स्पष्ट जानकारी रखी जाए कि पिछले वर्षों में बाढ़ नियंत्रण और तटबंधों के रखरखाव पर कितना पैसा खर्च हुआ, किस योजना पर कितनी राशि खर्च की गई, किस एजेंसी को काम दिया गया, जमीन पर कितना कार्य हुआ और कितने कार्यों का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट कराया गया।
*रंजीत कुमार सिंह के सरकार से प्रमुख सवाल
– पिछले दशकों में बिहार में बाढ़ नियंत्रण पर कुल कितना सरकारी धन खर्च हुआ?
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– पिछले 10 वर्षों में तटबंधों की मरम्मत और मजबूती पर कितनी राशि खर्च की गई?
– हर वर्ष बाढ़ से पहले तटबंधों का स्वतंत्र तकनीकी ऑडिट क्यों नहीं कराया जाता?
– जिन तटबंधों की मरम्मत और मजबूती के नाम पर भुगतान हुआ, उनकी वास्तविक स्थिति क्या है?
– बाढ़ नियंत्रण योजनाओं में कथित वित्तीय अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच क्यों नहीं कराई जाती?
– अधिकारियों और ठेकेदारों की जवाबदेही कौन तय करेगा?
– क्या बिहार के लिए कोई दीर्घकालिक और वैज्ञानिक बाढ़ नियंत्रण नीति लागू की जाएगी?
रंजीत कुमार सिंह ने कहा कि बिहार की जनता को केवल तत्काल राहत पैकेज नहीं, बल्कि बाढ़ से स्थायी राहत चाहिए। इसके लिए तटबंधों को वैज्ञानिक तरीके से मजबूत करने, नदियों की धारा और गाद प्रबंधन पर काम करने, जल निकासी व्यवस्था सुधारने तथा संवेदनशील क्षेत्रों में पहले से आपदा प्रबंधन की ठोस तैयारी करने की आवश्यकता है।
उन्होंने मीडिया और पत्रकारों से भी अपील की कि वे सरकारी घोषणाओं और प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित न रहें, बल्कि बाढ़ नियंत्रण योजनाओं के बजट, टेंडर, भुगतान और जमीन पर हुए कार्यों की भी पड़ताल करें।
अंत में उन्होंने कहा, “हर साल बाढ़ आए और हर साल जनता डूबे, लेकिन सरकार की योजनाएं और बजट भी हर साल चलते रहें—यह व्यवस्था अब सवालों के घेरे में है। बिहार की जनता को जवाब चाहिए कि दशकों के खर्च के बाद भी बाढ़ का स्थायी समाधान क्यों नहीं हुआ?”
